
मैं जब मुड़कर देखता हूं तो पिताजी के साथ बिताए प्यारभरे क्षण याद आते हैं। हम उन्हें बाऊजी कहते थे। वे अक्सर कहते थे, 'जब दूसरे लोग दीवार देखते हैं, मैं दरवाजे देखता हूं।' ठीक इसी तरह उन्होंने हमारी परवरिश की। उन्होंने मुझे जो अमूल्य शिक्षा दी वह बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। उनके जोश और लगन से तो सभी परिचित हैं, लेकिन उनका आभामंडल सादगीभरा रहा। उन्होंने 17 साल की किशोरवय में आंत्रप्रेन्योरशिप की यात्रा शुरू की थी। इस यात्रा में उन्होंने लाखों जिंदगियों को प्रेरणा दी, जिनमें समाज और बिजनेस से जुड़े लोग भी समान रूप से शामिल हैं।
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